रिपोर्ट:- चंदन पांडेय भांवरकोल/गाजीपुर। वर्ष 1942 की अगस्त क्रांति ने देश के छोटे-बड़े शहरों और गांवों के साथ गाजीपुर के ग्रामीण अंचलों को भी आंदोलित कर दिया था। भांवरकोल क्षेत्र के शेरपुर कलां गांव के लोगों ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी आंदोलन के दौरान क्षेत्र के क्रांतिकारी जमुना गिरि ने गौसपुर स्थित अंग्रेजों के हवाई अड्डे में आग लगा दी थी। हालांकि, स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी इस क्रांतिकारी की स्मृति में क्षेत्र में कोई स्मारक या स्तंभ नहीं बनाया जा सका है।
बताया जाता है कि 11 अगस्त 1942 को सिटी स्कूल में छात्रों ने बैठक कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने का निर्णय लिया था। अगले दिन स्कूल बंद करा दिया गया। इसके बाद युवा सड़कों पर उतर आए और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के नारे लगाने लगे। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने कई स्थानों पर लाठीचार्ज किया। छात्र और अंग्रेजी हुकूमत के बीच संघर्ष का दौर शुरू हो गया।
14 अगस्त 1942 को जमुना गिरि ने गौसपुर हवाई अड्डे को बनाया निशाना। बताया जाता है कि उस समय इस हवाई अड्डे से अंग्रेज आसपास के क्षेत्रों और सीमावर्ती इलाकों पर निगरानी रखते थे। जमुना गिरि ने अंग्रेजों की नजर से बचते हुए हवाई अड्डे में आग लगा दी। आग की लपटें उठते देख अंग्रेजी सैनिकों में हड़कंप मच गया और उन्होंने जमुना गिरि को घेरकर गोली चला दी। गोली उनके दाहिने हाथ में लगी और वह बेहोश होकर गिर पड़े।
होश आने पर उन्होंने खुद को जेल में पाया। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे माफी मांगने का दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने झुकने से इनकार कर दिया। परिजनों के अनुसार, उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वह सीने पर गोली खा सकते हैं, लेकिन अंग्रेजों से माफी नहीं मांगेंगे। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें प्रताड़ित किया और बाद में पांच वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।
18 अगस्त 1942 को शेरपुर के शिवपूजन राय के नेतृत्व में सैकड़ों युवा मुहम्मदाबाद तहसील पर तिरंगा फहराने के लिए निकले। इस दौरान ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और शहीदों का बदला लेने जैसे नारों से क्षेत्र गूंज उठा।
जमुना गिरि के भतीजे एवं शेरपुर के पूर्व प्रधान विद्यासागर गिरि ने बताया कि देश की आजादी के बाद जमुना गिरि को पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 1969 में ड्यूटी के दौरान उनका निधन हो गया। उनका कहना है कि देश की आजादी में योगदान देने वाले इस क्रांतिकारी की स्मृति को जीवित रखने के लिए आज तक क्षेत्र में उनके नाम पर न तो स्मारक बना और न ही कोई स्मृति स्तंभ स्थापित किया गया।










