330 रुपये कुंतल आलू! किसान की मेहनत हुई बेहिसाब, मुनाफे की तिजोरी आखिर किसके नाम?….

मोहम्मदाबाद/गाजीपुर। आलू को बेशक सब्जियों का बादशाह कहा जाता है, मगर उसकी पैदावार करने वाला किसान इन दिनों बाजार की बेयक़ीनी, मुफ़लिसी और बदहाल मुआमलात के बीच पिसता नजर आ रहा है। मोहम्मदाबाद क्षेत्र के कोल्ड स्टोरों में महीनों से किसानों की उपज बंद है और बताया जा रहा है कि कई जगह आलू का थोक भाव करीब 330 रुपये प्रति कुंतल तक सिमट गया है। यह कीमत किसानों के लिए महज बाजार भाव नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, लागत और उम्मीदों पर कुठाराघात जैसी है।

आलू की खेती कोई आसान मशक्कत नहीं। खेत तैयार करने से लेकर बीज, खाद, सिंचाई, दवाओं, मजदूरी और मशीनरी तक किसान को हर पड़ाव पर अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। ढैचा की बुवाई, जुताई, पलेवा, रोटावेटर, डीएपी, यूरिया, पोटाश, कैल्शियम, सल्फर और जिंक के बाद महंगा बीज, चिराई, उपचार और बुवाई—हर चरण किसान की लागत का बोझ बढ़ाता जाता है।फसल खेत में खड़ी होने के बाद भी किसान को राहत नहीं मिलती। तीन-चार बार सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, कीटनाशक और रोगनाशक दवाओं के छिड़काव के बाद जब आलू तैयार होता है तो खुदाई, मजदूरी, बोरियों, सिलाई, ट्रैक्टर भाड़े और कोल्ड स्टोर तक ढुलाई का खर्च सामने खड़ा होता है।

फसल खेत से निकली, लेकिन किसान की परेशानी नहीं निकली…..

कम भाव के कारण किसान तत्काल बिक्री से किनाराकशी कर कोल्ड स्टोर का रुख करता है। उम्मीद रहती है कि कुछ महीने बाद बाजार में नरमी खत्म होगी और भाव में इज़ाफा होगा। मगर जब लंबे इंतजार के बाद भी कीमत 330 रुपये कुंतल के आसपास मंडराए तो किसान के सामने मायूसी और आर्थिक बदहाली के सिवा क्या बचे?

किसानों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि खेत और कोल्ड स्टोर से निकलने वाले आलू की कीमत और बाजार में उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत के बीच इतना बड़ा फासला क्यों है?

किसानों का आरोप है कि मूल्य-निर्धारण की पूरी कवायद ऐसी है, जिसमें उत्पादक सबसे कमजोर कड़ी बनकर रह गया है। हालांकि व्यापारियों की ओर से परिवहन, छंटाई, भंडारण, पैकिंग और अन्य खर्चों को कीमत में शामिल किया जाता है, लेकिन किसान की शिकायत और सरोकार यह है कि उसे अपनी उपज के वास्तविक बाजार भाव की पारदर्शी जानकारी तक आसानी से नहीं मिलती।

किसान बोता है आलू, जोखिम उठाता है किसान, फिर मुनाफे की बारी में क्यों रह जाता है पीछे?….

यह सवाल अब सिर्फ एक किसान का नहीं, बल्कि पूरी कृषि व्यवस्था की तफ़्तीश मांग रहा है। उत्पादन से लेकर मंडी और मंडी से उपभोक्ता तक पहुंचने वाली पूरी ज़ंजीर में आखिर वह कौन-सा पड़ाव है, जहां किसान की मेहनत का मूल्य लगातार सिकुड़ जाता है?

किसानों का कहना है कि सरकार को सिर्फ उत्पादन बढ़ाने के ऐलान और योजनाओं तक सीमित न रहकर पूरी मूल्य-श्रृंखला की निगरानी करनी होगी।

किसानों की प्रमुख मांगें उत्पादन लागत का वास्तविक आकलन कर लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाए..

कोल्ड स्टोर, मंडी और बाजार के भाव की पारदर्शी जानकारी किसानों को मिले…

किसान और उपभोक्ता के बीच कीमत के अंतर की नियमित समीक्षा हो…

किसानों को सीधे थोक खरीदारों और प्रसंस्करण इकाइयों से जोड़ा जाए…

कोल्ड स्टोर में रखी उपज की बिक्री के लिए किसानों को बाजार की विश्वसनीय सूचना मिले….

ग्रेडिंग, पैकिंग और फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा दिया जाए…

330 रुपये सिर्फ भाव नहीं, किसान की बेबसी का आईना है। आलू का 330 रुपये प्रति कुंतल का भाव यदि वास्तविक बाजार स्थिति को दर्शाता है तो यह आंकड़ा महज अंकगणित नहीं है। इसके पीछे किसान की महीनों की मशक्कत, पूंजी, जोखिम, इंतजार और उम्मीद छिपी है।

विडंबना यह है कि किसान खेत में पसीना बहाता है, कोल्ड स्टोर का किराया देता है, परिवहन का खर्च उठाता है और बाजार की अनिश्चितता भी झेलता है, लेकिन अपनी ही उपज की कीमत तय करने में उसकी हिस्सेदारी नगण्य रह जाती है।

सवाल सीधा है। जब लागत किसान की, जोखिम किसान का और मेहनत किसान की है, तो उसकी उपज के मुनासिब दाम का फैसला करने में उसकी आवाज इतनी कमजोर क्यों।

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