भांवरकोल/गाजीपुर। पूर्वांचल की राजनीति और ग्राम्य नेतृत्व की चर्चा जब भी होगी, शेरपुर कला के पूर्व ग्राम प्रधान स्वर्गीय महेंद्र प्रसाद राय का नाम सम्मान और गौरव के साथ लिया जाएगा। वे केवल ग्राम प्रधान नहीं थे, बल्कि एक ऐसे जननेता थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, न्यायप्रियता, दूरदर्शिता और जनसेवा के बल पर गांव ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। आज भी शेरपुर और आसपास के गांवों के बुजुर्ग उनके कार्यकाल को पंचायत व्यवस्था का स्वर्णिम काल बताते हैं।
स्व. महेंद्र प्रसाद राय का जन्म एक प्रतिष्ठित किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय रामनरेश राय अपने समय के सम्मानित व्यक्तियों में गिने जाते थे। परिवार में सामाजिक नेतृत्व और जनसेवा की परंपरा रही। उनके छोटे भाई सुरेंद्र नाथ राय भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे और परिवार की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाते रहे।
शेरपुर में 41 वर्षों तक संभाली ग्राम पंचायत की कमान…..
स्व. महेंद्र प्रसाद राय ने वर्ष 1954 से 1995 तक लगातार 41 वर्षों तक शेरपुर ग्राम पंचायत का नेतृत्व किया। यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण मानी जाती है। इतने लंबे समय तक जनता का विश्वास बनाए रखना उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली की सबसे बड़ी पहचान थी।
उस दौर में पंचायत का निर्णय अंतिम माना जाता था। गांव के छोटे-बड़े विवाद, खेत-खलिहान के झगड़े, पारिवारिक मतभेद और सामाजिक समस्याएं बाबू साहब के दरबार में पहुंचती थीं और उनके निष्पक्ष निर्णय से सुलझ जाती थीं। उनकी न्यायप्रियता इतनी प्रसिद्ध थी कि लोग अदालत और थाने की बजाय पहले उनके पास पहुंचते थे।
नक्सल प्रभाव को रोकने में निभाई अहम भूमिका……
बिहार से नक्सल आंदोलन का प्रभाव जब सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा था, तब शेरपुर और आसपास के इलाकों में भी उसकी आहट महसूस की जाने लगी थी। उस कठिन दौर में स्व. महेंद्र प्रसाद राय ने सामाजिक एकता, जनजागरण और मजबूत नेतृत्व के माध्यम से क्षेत्र में नक्सली विचारधारा को पैर जमाने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीणों को संगठित रखने और सामाजिक समरसता बनाए रखने का उनका प्रयास आज भी लोगों द्वारा याद किया जाता है।
इमरजेंसी और चकबंदी के दौर में दिखाई अद्भुत सूझबूझ……
वर्ष 1975 का समय देश के लिए चुनौतीपूर्ण था। एक ओर देश में आपातकाल लागू था तो दूसरी ओर शेरपुर जैसी विशाल पंचायत में चकबंदी का कार्य चल रहा था। चकबंदी के दौरान अक्सर किसानों के बीच विवाद और तनाव की स्थिति बन जाती है, लेकिन बाबू महेंद्र राय ने अपनी दूरदर्शिता, धैर्य और नेतृत्व क्षमता के बल पर इस कठिन कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कराया। ग्रामीण आज भी बताते हैं कि यदि उस समय उनका नेतृत्व न होता तो चकबंदी का कार्य इतने शांतिपूर्ण तरीके से पूरा नहीं हो सकता था।
लखनऊ तक थी राजनीतिक पहुंच और प्रभाव……
पुराने राजनीतिक कार्यकर्ता बताते हैं कि बाबू महेंद्र राय का प्रभाव केवल शेरपुर तक सीमित नहीं था। उनकी पहुंच गाजीपुर से लेकर लखनऊ तक थी। प्रदेश के बड़े नेता जब भी जनपद आते थे तो उनसे मुलाकात अवश्य करते थे। स्थानीय राजनीति में उनकी राय को विशेष महत्व दिया जाता था।
वे ऐसे नेता थे जिनकी पहचान केवल राजनीतिक प्रभाव से नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता से बनी थी। यही कारण था कि वे सभी वर्गों और समुदायों में समान रूप से सम्मानित थे।
जनसेवा को बनाया था जीवन का उद्देश्य…….
स्व. महेंद्र प्रसाद राय ने राजनीति को कभी व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने इसे समाज सेवा का साधन माना। गरीबों की मदद, जरूरतमंदों को सहयोग, गांव के विकास और सामाजिक एकता को हमेशा प्राथमिकता दी।
उनका दरवाजा हर व्यक्ति के लिए खुला रहता था। कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी वर्ग या समुदाय का हो, उसके साथ समान व्यवहार किया जाता था। यही उनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह थी।
महेंद्र प्रसाद राय कि विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं उनके पुत्र जयप्रकाश राय उर्फ जेपी राय…..
स्व. महेंद्र प्रसाद राय की सामाजिक और राजनीतिक विरासत को उनके पुत्रों ने भी आगे बढ़ाया। उनके तीन पुत्र हैं — जयप्रकाश राय, प्रेम प्रकाश राय और स्वर्गीय नागेंद्र प्रसाद राय।
बड़े पुत्र जयप्रकाश राय उर्फ जेपी राय इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक हैं और पेशे से अधिवक्ता हैं। उन्होंने वर्ष 2005 से 2010 तक शेरपुर ग्राम पंचायत के प्रधान के रूप में कार्य किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने गांव के विकास और जनहित के कार्यों को प्राथमिकता दी।
वर्ष 2010 में पंचायत सीट पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होने के कारण परिवार की ओर से कोई प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतरा। इसके बाद वर्ष 2015 में जब सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित हुई, तब दूसरे पुत्र प्रेम प्रकाश राय की पत्नी मंजू राय ग्राम प्रधान निर्वाचित हुईं। पंचायत संचालन और विकास कार्यों की जिम्मेदारी जयप्रकाश राय ने प्रतिनिधि के रूप में निभाई और गांव के विकास को नई दिशा दी।
आज भी जीवित हैं बाबू महेंद्र राय के आदर्श……
स्व. महेंद्र प्रसाद राय आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, उनकी कार्यशैली, जनसेवा की भावना और न्यायप्रियता आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। शेरपुर की गलियां, चौपालें और ग्रामीणों की स्मृतियां आज भी उनके योगदान की कहानी सुनाती हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि बाबू महेंद्र राय ने अपने जीवन से यह साबित किया कि सच्चा नेता वही होता है जो पद से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों पर राज करता है। उनकी विरासत आज भी शेरपुर की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।










