बलिया। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर बक्सर और गाजीपुर की सीमा पर गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित मां मंगला भवानी का प्राचीन मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। विशेष रूप से नवरात्र में यहां दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
सोहांव विकास खंड के नसीरपुर मठ ग्रामसभा के अंतर्गत गंगा किनारे स्थित यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जिले के पूर्व जिलाधिकारी हरिसेवक राम द्वारा लिखित पुस्तक “बलिया एक दृष्टि में” के अनुसार, इस मंदिर का उल्लेख छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पटना जाते समय अपनी यात्रा डायरी में किया था, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1876 में जब यह क्षेत्र बलिया नहीं बल्कि गाजीपुर जिले में आता था, तब कोरंटाडीह तहसील में निर्माण कार्य के दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने मां मंगला भवानी की प्रतिमा को उखड़वाकर गंगा नदी में फेंकवा दिया था। मान्यता है कि इसके बाद उस अधिकारी पर देवी का प्रकोप हुआ—उसके बड़े पुत्र का निधन हो गया और अस्तबल के घोड़े मरने लगे। एक रात उसे स्वप्न में देवी ने प्रतिमा को पुनः स्थापित करने का आदेश दिया। इसके बाद उसने उजियार गांव के दरगाही यादव की मदद से प्रतिमा को गंगा से निकलवाकर पुनः स्थापित कराया, जिसके बाद उसकी स्थिति सामान्य हुई।
मन्नत पूरी होने पर बना भव्य मंदिर….
पहले मां मंगला भवानी का पूजन एक छोटे से कक्ष में होता था। करीब दो दशक पहले बक्सर के संतोष नामक कारोबारी ने यहां संतान प्राप्ति की मन्नत मांगी थी। मन्नत पूरी होने पर उन्होंने पुराने कक्ष को हटवाकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज एक शानदार धार्मिक स्थल के रूप में प्रतिष्ठित है।
वर्तमान में यह मंदिर न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी जाना जाता है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।










